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छोटे स्कूल में पढ़ते हुए देखा बड़ा सपना मेहनत की और आज हैं अन्तरराष्ट्रीय स्तर के लेप्रोस्कोपिक सर्जन

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मध्यप्रदेश के शुजालपुर के डॉ. देशमुख ने लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में नाम कमाया

शुजालपुर के डॉ. अभिजीत देशमुख ने निम्न मध्यमवर्ग परिवार आर्थिक बाधाओं को पार कर चिकित्सकीय क्षेत्र में नाम किया रोशन

छोटे शहर के निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच जन्म लेने और पले-बढ़े होने के बावजूद भी आप अपनी उम्मीदों के अनुरूप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। शुजालपुर से जुड़े लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. अभिजीत देशमुख की कहानी युवाओं को यही बात सिखाती है। खुद पर भरोसा रखें, अपने सपने को पाने के लिये ईमानदारी से मेहनत करें तो जीवन में वो सबकुछ पाया जा सकता है जो आप समझते हैं कि बड़े शहरों में रहकर, बड़े स्कूल में पढ़कर मिल सकता है। डॉ. अभिजीत देशमुख आज अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर और विशेषकर देश के जाने माने लेप्रोस्कोपिक सर्जन हैं। उ

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में जन्मे डॉ. अभिजीत देशमुख को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल व उसके आसपास के शहरों में पहली बार लेप्रोस्कोपिक सर्जरी करने का गौरव प्राप्त है। डॉ. अभिजीत देशमुख की पत्नी श्रीमती रूपाली देशमुख अब प्री-मेडिकल टेस्ट के लिए कोचिंग लेती हैं। वह गरीब और जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क कोचिंग देती है। इनकी बेटी संजना देशमुख खुद डॉक्टर बनने की राह पर अग्रसर हैं।

बचपन में ही महाराष्ट्र से मप्र तक का सफर
– डॉ. अभिजीत देशमुख ने बचपन में ही महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश तक की यात्रा की। महाराष्ट्र के कोल्हापुर में पांच मार्च 1967 में हुआ। इनके पिताजी सरकारी शिक्षक थे। प्रारंभिक शिक्षा कोल्हापुर में ही हुई, लेकिन इसके बाद पिताजी का मध्यप्रदेश के शुजालपुर में स्थानांतरण होने से डॉ. देशमुख सपरिवार यहां आ गए।कोल्हापुर में डॉ. देशमुख के परिजन समाजसेवा में सक्रिय थे। वहां डॉ. देशमुख शहर के बड़े स्कूल में भर्ती थे। लेकिन शुजालपुर में आने के बाद स्थानीय स्कूल में भर्ती हुए।

स्कूल कैसा भी, मेहनत जरूरी इसी भावना ने बढ़ाया
– शुजालपुर में जब इन्हें कोलहापुर के बड़े स्कूल की तुलना में छोटे स्थानीय स्कूल में भर्ती कराया तो शुरुआत में अच्छा नहीं लगा। किसी बड़े शहर में जाकर बड़े स्कूल में भर्ती होने की जिद की, लेकिन माता -पिता की अमुल्य समझाईश और पारिवारिक स्थिति को देखकर देशमुख ने खुद ही तय किया कि यहां के स्कूल में पढ़कर भी अच्छा कर सकते हैं। इसी भावना ने उन्हें आगे बढ़ने- पढ़ने की प्रेरणा दी। डॉ. अभिजीत ने आत्म विश्वास को मजबूत बनाए रखा।

गांव में चिकित्सा सुविधा को कमी देखी, डॉक्टर बनना तय किया
– देशमुख ने हायर सेकंडरी उत्तीर्ण करने के पहले ही डॉक्टर बनने का तय कर लिया था। शुजालपुर के आसपास के गांव में जब वे चिकित्सा सुविधाओं की कमी देखते थे तो उन्हें अच्छा नही लगता था। इनके लिए वे कुछ बेहतर करना चाहते थे। अपने आसपास के अन्य डाँक्टर्स – डाॅ. पुरशोत्तम शास्त्री, डाॅ श्रेणिक जैन, डाॅ व्यास, डाॅ निर्मल जैन, डाॅ शुक्ला, डाॅ जे पी देशमुख, डॉ विजयवर्गीय, डॉ परूलकर, डॉ विनोद वाद्यवानी, डाॅ वाजपयी से भी उन्होंने प्रेरणा ली। वे समाज की सेवा करने वाला ऐसा ही प्रोफेशन अपनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने पीएमटी की तैयारी की। परीक्षा दी और अच्छे अंकों से उसमें सफल भी हुए। 12वीं होलकर साइंस कॉलेज से की। यहीं पर मेडिकल की परिक्षा की तैयारी की। एमबीबीएस में चयन हुआ तो एक साल ग्वालियर मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की इसके बाद भोपाल स्थानांतरण कराया।

शादी के तुरंत बाद आई एमएस परीक्षा की चुनौती, स्वीकारी और सफल हुए
– देशमुख ने 1992 में एमबीबीएस किया और वे एमएस करना चाहते थे। एमबीबीएस के तुरंत बाद ही उनकी शादी हो गई। एमएस के नियम भी बदल गए। उन्हें इसकी परीक्षा पास करना थी] जिसके लिए सिर्फ एक माह का समय था। घर-परिवार चलाने के बीच एमएस प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। उन्होंने दोनों चुनौतियों को स्वीकारा और सफल हुए।

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की नई तकनीक शहर में लाए
– डॉ. देशमुख ने पढ़ाई के दौरान ही दूरबीन आधारित लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में विशेषज्ञता हासिल करने की ठानी। इसके लिए वे मुंबई के जानेमाने सर्जन डॉ. वीएन श्रीखंडे के पास गए। यहां इन्होंने इस सर्जरी को सीखा- समझा और भोपाल आए। भोपाल व आसपास के शहरों के लिए ये एक नई तकनीक थी। करीब चार साल मेहनत की। लोन लेकर मशीनरी व अन्य संसाधन जुटाए। शहर के छोटे अस्पतालों में इससे इलाज शुरू किया। शहरों के अस्पतालों में इस सर्जरी से कई गरीब लोगों को ठीक किया। दूरबीन आधारित ऑपरेशन की नई तकनीक का लाभ हजारों लोगों ने लिया।

सर्जरी से खुश परिवार ने दिया पहला पुरस्कार
– डॉ. देशमुख ने आष्टा शहर की एक वृद्ध महिला का इलाज किया। सर्जरी से उसकी बीमारी दूर हुई। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद एक दिन महिला अपने नाती-पोतों के 15 सदस्यों से अधिक बड़े परिवार के साथ अस्पताल आई। डॉ. देशमुख को बहुत धन्यवाद देकर बरकत- ईदी के दस-दस रुपए के दस नोट दिए शुभकामनाएं दीं। देशमुख इसे अपना सबसे बड़ा और अच्छा पुरस्कार मानते हैं। उन्होंने ये नोट आज भी संभाल रखे हैं।

समय प्रबंधन से परिवार को रखा खुश
– डॉ. देशमुख का कहना है कि उन्होंने कभी अपने व्यक्तिगत जीवन और व्यवसायिक जीवन को एक दूसरे पर हावी नहीं होने दिया। समय का प्रबंधन कुछ ऐसा किया कि परिवार को भी गुणवत्ता वाला समय मिला। बतौर डॉक्टर अपने मरीजों को भी पूरी तरह संतुष्ट रखा। उनका कहना है कि हर दिन मेडिकल साइंस में नवाचार होते हैं और इसके तहत खुद को भी अपडेट रखते हैं। वर्कशॉप व अन्य माध्यमों से नई चीजें हमेशा सीखते रहते हैं। देशमुख का कहना है कि उनके पेशे में खुद को हमेशा सबसे आगे रखने और अपना नाम बनाए रखने की चुनौती होती है] लेकिन कभी भी खुद को पहचान के संकट के दबाव में नहीं आने दिया। आर्थिक परेशानियां आई, लेकिन समाज की सेवा में कभी इसे रूकावट नही बनने दिया।

समाज का भी रखा ध्यान
– डॉ. देशमुख मेडिकल की दुनिया में बड़ा नाम कमाने के बावजूद समाज से दूर नहीं हैं। लोगों के बीच जाकर चिकित्सा शिविर और अन्य माध्यमों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। देशमुख ने अपने माता-पिता के सामने ही उनके नाम से शिविर आयोजित किए और लोगों का इलाज किया। उनका कहना है कि माता पिता की स्मृति की बजाए उनके नाम से उनके सामने ही सेवाकार्य किए जाएं तो उन्हें ज्यादा खुशी होगी।

10 हजार की जांच, 650 का निशुल्क ऑपरेशन
– डॉ. देशमुख समाज की सेवा उनके बीच जाकर ही करते है। गांव में जाकर लोगों से उनकी सेहत के बारे में पूछताछ कर उन्हें स्वास्थ्य सुविधा-सुझाव देते है। अभी कोरोना कॉल के पहले शुजालपुर के आसपास 10100 लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण किया। इनमें से 650 को भोपाल लेकर निशुल्क उनका ऑपरेशन कराया।

 

छात्राओं के पोषण की जांच की, ताकि मातृ शिशु मृत्युदर घटे
– डॉ. देशमुख ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा को लेकर विशेष प्रयास करते रहे हैं। खासतौर पर महिला एवं बाल विकास को लेकर चिंतित रहते हैं। प्रदेश के मातृ-शिशु मृत्युदर को घटाने डॉ. देशमुख ने ” स्वस्थ नारी स्वस्थ प्रदेश ” कार्यक्रम चलाकर कॉलेज जाने वाली छात्राओं के पोषण की जांच कराई। और सरकार के साथ मिलकर पोषण के प्रति जागरुकता कार्यक्रम किए, ताकि जब वे मां बने तो पोषण की कमी से उन्हें कोई शारीरिक दिक्कत न आए। यहीं काम स्कूल जाने वाले बच्चों को लेकर भी किया। बच्चों के स्कूल में जाकर एनिमेशन फ़िल्म दिखाकर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया। पर्यावरण- स्वच्छ्ता पर जागरूक किया।

इन तीन सवालों से परखें आप कितने सफल
सिर्फ़ पैसा सफलता का पैमाना ना हो,
– डॉ. अभिजीत देशमुख का कहना है कि आप जीवन में कितने सफल हुए हैं, उसके लिए तीन सवालों को पैमाना बनाएं। सबसे पहले ये देखें कि आपने अपने जीवन को लेकर जो लक्ष्य तय किए थे वे कितने पूरे हुए आप अपने परिवार को कैसा जीवन दे पा रहे हैं? इसके साथ ही ये भी देखें कि समाज की सेवा कितनी और किस तरह से कर रहे हैं? इनके आधार पर ही तय होगा कि आप कितने सफल हुए या असफल रहे। डॉ. देशमुख अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता की दूर दृष्टि, सोच- संस्कारों के साथ परिवार के सदस्यों को देते हैं। मुंबई में उन्हें लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की सीख देने वाले डॉ. वीएन श्रीखंडे, अपने वरिष्ठ डॉक्टर, मित्रों को देते हैं। इन्होंने ही समय समय पर उचित मार्गदर्शन दिया।

उद्देश्य स्पष्ट व धैर्य रखें तो मिलेगी सफलता
– डॉक्टर बनने की सोच रहे युवाओं को देशमुख कहते हैं कि आत्म विश्वास के साथ ईमानदारी मेहनत को मिलाकर काम करें। अपना उद्देश्य स्पष्ट व धैर्य भी रखें। उनके अनुसार सफलता मिलने के बाद भी खुद को विनम्र बनाए रखें तो सफलता के साथ आपको संतुष्टि भी मिलेगी।

     

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