Wed. May 22nd, 2024

जैविक हथियार : खतरे की घंटी

1 min read

 

प्राचीन समय से यह देखा गया है कि इस धरती पर युद्ध का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हुआ। हम वैश्विक शांति की जितनी अधिक कामना करते हैं, उतना ही अधिक युद्धों में उलझते जा रहे हैं। यह युद्ध चाहे पड़ोसी देशों के बीच सीमाओं को लेकर हुए हों या संसाधनों के बँटवारे को लेकर हुए हों या फिर आतंकवाद से उपजी परिस्थितियों के कारण हुए हों, इन सबके बीच दिन-प्रतिदिन इंसान व इंसानियत मृतप्राय होती जा रही है। युद्ध की सतत आशंका के कारण पूरी दुनिया में आधुनिक हथियारों के निर्माण की होड़ बढ़ती जा रही है। विगत सौ वर्षों में हथियारों के निर्माण में बेतहाशा वृद्धि देखी जा रही है। आधुनिक हथियारों के निर्माण में वृद्धि के साथ ही युद्ध के पारंपरिक तौर-तरीकों में भी बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। इनमें एक नया तरीका जैविक हथियारों का भी है।

कोरोना वायरस संक्रमण के तौर तरीकों को देखते हुए जैविक हथियार व जैव आतंक चर्चा के केंद्र में आ गया है। कोविड- 19 नामक संहारक बीमारी को पैदा करने वाले कोरोना वायरस के निर्माण और उसे पूरे विश्व में फैलाने को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। वर्तमान में आतंक के एक नए हथियार के रूप में उच्च तकनीकी आधारित जैव आतंक का प्रयोग किया जाने लगा है। जैव आतंक का प्रयोग न केवल आतंकवादी समूह कर रहे हैं, बल्कि शक्ति संपन्न राष्ट्र भी प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग न लेकर परोक्ष रूप से जैव आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं. आधुनिक काल में जैव आतंकवाद को ऐसी क्रूर गतिविधि के रूप में चिन्हित किया जा सकता है जिसके अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विषाणुओं, जीवाणुओं तथा विषैले तत्वों को मानव द्वारा ही प्राकृतिक अथवा परिवर्धित रूप में विकसित कर अपने लक्ष्य संधान हेतु किसी राष्ट्र के विरुद्ध निर्दोष जन, पशुओं अथवा पौधों को गंभीर हानि पहुँचाने हेतु योजनाबद्ध रूप से मध्यस्थ साधन के रूप में दुरुपयोग किया जाता है।

वर्तमान समय में आत्मघाती जैव आतंकवाद की समस्या भी सामने आ रही है जिसमें आतंकवादी स्वयं को घातक रोगकारी संक्रमण से संक्रमित करने के पश्चात सामान्यजन के मध्य जा कर उन्हें भी संक्रमित कर देता है और पूरे क्षेत्र को विनाशक रोग से भर देता है। ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में मेसोपोटामिया के अस्सूर साम्राज्य के लोगों ने शत्रुओं के पानी पीने के कुओं में एक विषाक्त कवक डाल दिया था, जिससे व्यापक पैमाने पर शत्रुओं की मृत्यु हो गई थी।

यूरोपीय इतिहास में तुर्की तथा मंगोल साम्राज्यों द्वारा संक्रमित पशु शरीरों को शत्रु राज्य के जल स्रोतों में डलवा कर संक्रमित करने के कई उदाहरण मिलते हैं। प्लेग महामारी के रूप में बहुचर्चित ‘ब्लैक डेथ’ (Black Death) के फैलने का प्रमुख कारण तुर्की तथा मंगोल सैनिकों द्वारा रोग पीडि़त मृत पशु शरीरों को समीपवर्ती नगरों में फेंका जाना बताया जाता है। आधुनिक युग में जैविक हथियारों का पहली बार प्रयोग जर्मन सैनिकों द्वारा प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) में एंथ्रेक्स तथा ग्लैंडर्स के जीवाणुओं द्वारा किया गया था।

जापान-चीन युद्ध (1937-1945) तथा द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) में शाही जापानी सेना की विशिष्ट शोध इकाई ने चीनी नागरिकों तथा सैनिकों पर जैविक हथियारों के प्रयोग किये जो बहुत प्रभावशाली नहीं सिद्ध हो पाए परंतु नवीन अनुमानों के अनुसार, लगभग 6,00,000 आम नागरिक प्लेग संक्रमित खाद्य पदार्थों के प्रयोग से प्लेग तथा हैजा बीमारी से पीड़ित हुए थे। वर्ष 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका में एंथ्रेक्स के आक्रमण के कई मामले सामने आये थे जिसमें आतंकवादियों ने एंथ्रेक्स संक्रमित पत्र अमेरिकी कांग्रेस के कार्यालयों में भेजे जिसके कारण पाँच व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी। इस घटना ने राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैव सुरक्षा तथा जैव आक्रमण से बचाव के उपाय विकसित करने की आवश्यकता को पर्याप्त बल प्रदान किया था।

जैव आतंकवाद के माध्यम से प्रायः विषाणु या जीवाणु के साथ नई तकनीकी की सहायता से हमला किया जाता है जो अन्य हथियारों से और भी ज्यादा खतरनाक होता है। उल्लेखनीय है कि कीटाणुओं, विषाणुओं अथवा फफूंद जैसे संक्रमणकारी तत्वों जिन्हें जैविक हथियार कहा जाता है, का युद्ध में नरसंहार के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। जैव आतंकवाद के वाहक के रूप में तकरीबन 200 प्रकार के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस पर्यावरण में मौजूद हैं। एंथ्रेक्स, प्लेग, बोटूलिज्म, टूलेरीमिया, ग्लैन्डर, जैसे खतरनाक जीव इसमें शामिल हैं।

कई वाहक पाउडर के रूप में होते हैं। इन्हें आसानी से पानी या हवा में छोड़ा जा सकता है या किसी के भोजन में मिलाया जा सकता है। ये 24 घंटे के अंदर प्राणी और अन्य जीवों की जान ले सकते हैं। एक रासायनिक हथियार मानव निर्मित रसायन के उपयोग से बनता है। अर्थात् रासायनिक हथियारों में उन हथियारों का इस्तेमाल होता है जो घातक रसायनों के उपयोग से बनते हैं और आबादी के लिये जान और माल के नुकसान का कारण बनते हैं।

ये हथियार जीवन को नष्ट करने के लिये इस्तेमाल किये जाते हैं। रासायनिक युद्ध से संपूर्ण मानवीय समुदाय को खत्म किया जा सकता है। रासायनिक हथियारों में ज़हरीला रसायन होता है जो IEDs, Mortars, मिसाइलों और अन्य एजेंटों का उपयोग कर प्रसारित किया जाता है। इन्हीं एजेंटों के कारण विस्फोट होता है और परिणामस्वरूप ज़हरीले रासायनिक हवा में फैल जाते हैं। इस रसायन से किसी भी व्यक्ति की कुछ ही सेकेंड में मौत हो सकती है। इन रासायनिक हथियारों का प्रभाव तब तक रहता है जब तक हवा को साफ नहीं कर दिया जाता है। रासायनिक हथियार के कुछ उदाहरण- मस्टर्ड गैस, सरीन, क्लोरीन, हाइड्रोजन साइनाइड और टीयर गैस के रूप में हैं।

परमाणु हथियार रासायनिक हथियारों की तुलना में अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि इनके विनाश की कोई सीमा नहीं होती है। एक परमाणु हथियार जीवन के साथ-साथ उससे संबंधित हर चीज को नष्ट कर सकता है। परमाणु हथियार का परिनियोजन पूरे शहर को नष्ट कर सकता है और आसपास की चीजों को खत्म कर सकता है। परमाणु हथियार में परमाणु विखंडन की प्रक्रिया होती है जिसके माध्यम से बड़े पैमाने पर यह विस्फोट करने में सक्षम होता है। परमाणु हथियार के कुछ उदाहरण हैं- परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, न्यूट्रॉन बम, यूरेनियम, प्लूटोनियम आदि।

जैविक हथियार नियंत्रण के लिये प्रयास
जैविक हथियार के निर्माण और प्रयोग पर रोक लगाने के लिये कई विश्व में कई सम्मेलन हुए। सबसे पहले वर्ष 1925 में जिनेवा प्रोटोकॉल के तहत कई देशों ने जैविक हथियारों के नियंत्रण के लिये बातचीत शुरू की थी। वर्ष 1972 में बायोलॉजिकल वेपन कन्वेंशन (Biological weapon Convention) की स्थापना हुई और 26 मार्च 1975 को 22 देशों ने इसमें हस्ताक्षर किये। भारत वर्ष 1973 में बायोलॉजिकल वेपन कन्वेंशन (BWC) का सदस्य बना और आज 183 देश इसके सदस्य हैं।

भारत में जैव आतंकवाद की चुनौतियों से निपटने के लिये गृह मंत्रालय एक नोडल एजेंसी है इसके साथ ही रक्षा मंत्रालय, डीआरडीओ, पर्यावरण मंत्रालय इत्यादि भी सक्रिय रुप से जैव आतंकवाद पर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने जैव आतंकवाद से निपटने हेतु एक दिशा-निर्देश तैयार किया है जिसमें सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ निजी एजेंसियों की सहभागिता पर भी बल दिया गया है।

जैव-आतंकवाद आज के समय में सबसे बड़ा खतरा है और सशस्त्र बलों की चिकित्सा सेवाओं को इस समस्या से निपटने में सबसे आगे होना चाहिये। आज के संदर्भ में जैव आतंकवाद ‘संक्रामक रोग’ के रूप में फैल रहा है। परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों के कारण स्थिति निरंतर जटिल होती जा रही है जिससे नई चुनौतियाँ पैदा हो रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जैव आतंकवाद की रोकथाम की क्षमता केवल पशु चिकित्सकों में ही है। विश्व स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कमीशन फॉर जुनोसिस की स्थापना की है। इसके तहत जुनोसिस डिज़ीज कंट्रोल बोर्ड एवं कंट्रोल ऑफ वेक्टर बॉर्न डिज़ीज सेंटर कार्यरत हैं। भारत में इसे लेकर गंभीरता काफी कम है, जबकि आए दिन यहाँ आतंकवादी हमले होते रहते हैं।

जैव आतंकवाद के वाहकों की रोकथाम के लिये सरकार को वाइल्ड लाइफ हेल्थ सेंटर, फॉरेन्सिक सेंटर, जुनोसिस सेंटर की स्थापना किये जाने की आवश्यकता है। टीके और नई औषधियों पर शोध को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। चूँकि जैव आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है अतः सभी हितधारकों को मिलजुल कर ना केवल इस दिशा में सुरक्षा उपायों को अपनाए जाने की आवश्यकता है बल्कि भविष्य में ऐसी आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिये शोध की भी आवश्यकता होगी। जैविक आपदा प्रबंधन से संबंधित राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी किये जाने की जरूरत है। आतंकवादियों द्वारा जैविक हथियार इस्तेमाल कर सकने की आशंका के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है।

लेखक

डाॅ. दीपक कोहलीउपसचिव

वन एवं वन्य जीव विभाग, उत्तर प्रदेश

 

More Stories

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Double Categories Posts 1

Double Categories Posts 2

Posts Slider